Wednesday, June 9, 2010

अमेरिका से सामरिक दोस्ती की प्रासंगिकता

कम्युनिस्ट और मुसलमानों के साथ ही भारत के अनेक लोग अमेरिका से ठोस सम्बन्ध बनाने के विरुद्ध रहते हैं | इनका कहना है कि अमेरिका विश्वसनीय नहीं है | ये लोग 71 के युद्ध का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा रहता है | अन्य उदाहरण भी दिए जाते हैं| किन्तु,यह आधा सच है | असल, में स्वतंत्रता के बाद हमारे हुक्मरानों ने कुछ ऐसे अतार्किक निर्णय लिए,जो अमेरिका सहित देश के विपक्ष और मीडिया को भी असहज करने वाले थे | चाहे चीन को मान्यता देने का प्रश्न  हों या फिर तिब्बत को उपहार स्वरूप चीन को प्रदान करने की बात हों |ये दोनों बातें अमेरिका को असहज करने वाले थे | इसी क्रम में 1956 में हंगरी के स्वतन्त्र चुनाव के मामले में, भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया जा सकता है | जब पंडित नेहरु की विदेश नीति की आलोचना जितनी अमेरिका ने  नहीं की, उतनी भारतीय जनता ने की थी | संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हंगरी में स्वतन्त्र चुनाव के प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करना किसी के भी समझ से परे था | ऐसे में अमेरिका पर अनर्गल आरोप लगाना, सही प्रतीत नहीं होता | किसी से ठोस  रिश्ते बनाना हमेशा द्विपक्षीय संबंधो पर आधारित होता है | आज देश पर कई तरह के खतरे हैं | पड़ोस में अशांति फ़ैलाने वाले देश हैं |जिनका मिशन भारत को नष्ट-भ्रष्ट करना है | ऐसे में, किसी शक्तिशाली देश से अत्यधिक मधुर सम्बन्ध बनाना समय की मांग है |इस मामले अमेरिका से बेहतर और कोई देश नहीं है | वह लोकतंत्र का हिमायती है | वो हमारे धार्मिक मूल्यों को अत्यधिक महत्त्व देता है |आज अमेरिका आर्थिक संकट में है | ऐसे में हम उसकी सहायता कर के अपने संबंधों को एक नया आयाम दे सकते हैं |
--अनुराग पाण्डेय

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