Saturday, September 10, 2011

3 करोड़ 20 लाख रु.की लागत से विन्ध्याचल में महायज्ञ का आयोजन



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विन्ध्याचल के पश्चिम में स्थित शिवपुर में, ३ करोड़ २० लाख रु.की लागत से होने वाले एक  महायज्ञ की चर्चा आम लोगों में खूब हो रही है | बहुजन-हिताय, इस यज्ञ का उद्देश्य बताया जा रहा है |यह यज्ञ पिछले ४ अप्रैल से शुरू हो कर २२ जून तक चलेगा |
ज्ञात हो कि इस यज्ञ में २००० टीना शुद्ध देशी घी ,50 टन गुड़,25 टन मेवा और 12 लाख नारियल का प्रयोग किया जा रहा है | यज्ञकर्ता हैं , ब्रह्म गुरु,अवधूत भगवान हनुमान दास जी महाराज |
जिस शिवपुर में इस यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है ,वहां की कुल जनसंख्या लगभग 5 हजार है |जिसमें लगभग 70 फ़ीसदी संख्या ऐसे लोगों की है ,जो गरीबी के दायरे में आते हैं |
अब,सवाल यह उठता है कि जिस क्षेत्र के अधिसंख्य लोगों के सामने गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी, आवास-विहीनता,  शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं विद्यमान हों,उस क्षेत्र में इतने ज्यादा पैसे से यज्ञ का आयोजन करवाना क्या जायज है ? आम लोगों और बुद्धिजीवियों की राय इस पर अलग-अलग हो सकती है|किन्तु,यह मूल प्रश्न अपने स्थान पर कायम है कि क्या इसे वास्तव में धर्म-सम्मत माना जाना चाहिए ?
वेद और पुराणों के रचयिता ,भगवान वेदव्यास जी का कहना है | अष्टादश पुराणानाम व्यासस्य वचनं द्वय,परोपकार पुण्याय,पापाय परपीडनं. इसी तरह मानसकार तुलसी बताते है कि  परहित सरिस धर्म नहीं भाई ,परपीड़ा सम नहि अधमाई |
स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि आत्मवत सर्वभूतेषु - क्या यह वाक्य मात्र पोथी में निबद्ध रखने के लिए है ? जो लोग गरीबों को रोटी का एक टुकड़ा नहीं दे सकते ,वे फिर मुक्ति क्या देंगे |आगे कहते हैं कि धर्म की बात सुनानी हो तो पहले देश के लोगों के पेट और छत की चिंता को दूर करना चाहिए | केवल व्याख्यान देने और यज्ञ करने से कुछ नहीं होने वाला| पहले, रोटी और आवास ,फिर धर्म की बातें और आयोजन |
-- मेरा मानना है कि कोई भी सच्चा धार्मिक और अभिनव मनुष्य इस तरह के धार्मिक आयोजनों का समर्थन नहीं करेगा | फिर, सवाल यह भी है कि इतने रुपयों की व्यवस्था कहाँ से हुई ? क्या भक्तों द्वारा चंदे में दी गई है | यदि हाँ ,तो उसका हिसाब -किताब, लोगों को बताया जाना चाहिए |
इस यज्ञ से जिन धार्मिक उपलब्द्धियों को पाया जाना है | उसमे ये लोग कहाँ तक सफल होंगे ,यह तो भविष्य के गर्भ में है |किन्तु, एक बात तय है कि इस महायज्ञ से उस क्षेत्र के गरीबों का उपहास उडाया जा रहा है | जो कि धर्म- विरुद्ध है | इन पैसों का इस्तेमाल यदि शिवपुर में गरीबी उन्मूलन और नागरिक सुविधाओं को सुनिचित करने में किया जाता,तो ज्यादा बेहतर होता ||

Friday, May 27, 2011

punjab-kesari

Better late than never.

--अनुराग पाण्डेय

Sunday, February 20, 2011

आज का ''युधिष्ठिर '' ; और यक्ष -प्रश्न

यक्ष-प्रश्न;-- कैंडीडेट युधिष्ठिर ,राजन | प्रश्न यक्ष का जारी 
कौन  हवा से तेज ,कौन है  यहाँ भूमि से भारी ||
किसे मारता तब लीडर ,बनता धन का अधिकारी |
हर चुनाव में ,अंत समय ,क्या होता विस्मयकारी ||

युधिष्ठिर का उत्तर ,--झूठ हवा से तेज ,वोट का मूल्य भूमि से भारी |
आत्मा मारा तब लीडर ,बनता धन का अधिकारी ||
बारम्बार भ्रष्ट को चुनना ,सचमुच विस्मयकारी |
उत्तर सुनकर  'यक्ष ' गिर पड़ा, मूर्छा अब तक जारी ||










--अनुराग पाण्डेय

Tuesday, February 15, 2011

अग्नि वाणी: Yogeshvar Shree Krishna

अग्नि वाणी: Yogeshvar Shree Krishna

--अनुराग पाण्डेय

Yogeshvar Shree Krishna


Wherever there is Krisha,the master of all mystics,and wherever there is Arjuna,the supreme archer,there will also certainly be opulence,victory,extraordinary power,and morality.That is my opinion.

--अनुराग पाण्डेय
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Thursday, February 3, 2011

ईमानदार प्रधानमंत्री की लाचारी

सामान्यतः देश में  यह धारणा प्रबल है कि हमारे प्रधानमंत्री साहब बड़े ईमानदार और नेक-दिल इन्सान हैं |सन 90 के आसपास ,जब वे देश के वित्तमंत्री थे,उस समय अर्थव्यवस्था की स्थिति बड़ी दयनीय हालत में थी| देश का संचित सोना भी गिरवी रख दिया गया था |उस विषम स्थिति से देश को सफलतापूर्वक बाहर निकालने का श्रेय इन्ही मनमोहन सिंह को दिया जाता है |अब सवाल यह उठता है कि इतने सक्षम व्यक्ति  आज इतने लाचार क्यों हैं?  टू जी स्पेक्ट्रम,आदर्श हाऊसिंग और कॉमनवेल्थ जैसे महाघोटाले इनके कार्यकाल में हो चुके हैं |वर्तमान में इस ईमानदार प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में कितने बेईमान हैं |यह बताना मुश्किल काम है | महज कुछ घोटाले ही सामने आ पाए हैं | कितने और घोटालेबाज जनप्रतिनिधि इनके साथ हैं |यह सामने आना अभी बाकी है |इस ईमानदार प्रधानमंत्री के 5 वर्षीय कार्यकाल में इतनी बड़ी राशि का घोटाला किया जा चुका है,जितना कि पूरे ब्रिटिश राज में भी नहीं किया जा सका था | ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी,अशोक चह्वाण जैसे दिग्गज घोटालेबाज कई वर्षो से इनकी  मंडली  में शोभा पा रहे थे |अभी कुछ दिनों पहले तक मनमोहन  सिंह यही कहते रहे कि कोई घोटाला नहीं हुआ| किन्तु कैग कि रिपोर्ट के बाद इनके स्वर में कुछ बदलाव आया | बावजूद इसके इनके कुछ सिपहसलार कैग कि रिपोर्ट को झुठला देने पर आमादा थे |लेकिन विपक्ष और जनता के दबाव के बाद ही इनकी बोलती बंद हो पाई | अब बहस का विषय यह होना चाहिए की, क्या किसी  व्यक्ति को  ईमानदारी का दावा करने मात्र से ही, ईमानदार मान लेना चाहिए ? जैसा की छद्म- धर्मनिरपेक्षकों को सच का धर्मनिरपेक्ष मान लिया जाता है | इसका जवाब नहीं में ही होना चाहिए | घोटालों की इस महा-विभीषिका के दौर में प्रधानमंत्री के सामने आज अग्नि परीक्षा की स्थिति है |स्विट्जरलैंड  की एक पत्रिका ''स्विट्जर इलस्ट्रेट'' ने 19 नवम्बर, 1991 के अपने अंक में तीसरी दुनिया के अनेकों ऐसे राजनेताओं के खातों का विवरण दिया जिसमें अरबों डॉलर पड़े हुए थे |इन नेताओं में राजीव गाँधी का भी नाम दर्ज था ,जिन्होंने बोफोर्स   के सौदे के बाद मिली दलाली का हिस्सा उस अकाउंट में  जमा  कर रखा था |पत्रिका ने के.जी. बी. के सूत्रों के हवाले से यह भी बताया की सोनिया गाँधी ने अपने नाबालिक बेटे के नाम से स्विस बैंक में एक गुप्त अकाउंट खोल रखा है ,जिसमे 2.5 अरब स्विस फ्रेंक जमा है जो लगभग 2 .2 अरब डॉलर के बराबर है |अगर इस पैसे की गणना आज के दर से की जाय  तो यह रकम 10 हजार करोड़ रु. के बराबर होगी | यह बात 1991 के दौर की है | आशय स्पष्ट है | यदि मनमोहन सिंह वास्तव में एक ईमानदार व्यक्ति हैं |तो वे पहले सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करें |तभी उनके ईमानदार होने की अफवाह को सही माना जायेगा |अन्यथा वो ईमानदारी का दावा करने के लिए स्वतंत्र हैं |
आज के अख़बारों से पता चला कि ए. राजा और उनके कुछ दरबारियों की आज गिरफ्तारी हुई  है |सुनने में लोगों को अच्छा लगा होगा |किन्तु इससे होगा क्या ? कुछ महीनों की नजरबंदी , फिर जमानत | क्योंकि भ्रष्टाचार के बिरुद्ध हमारे कानूनी किताबों में ज्यादा कुछ है नहीं |वैसे भी ये गिरफ्तारियां देर से हुई हैं,ताकि भ्रष्टाचार के गर्भ से जन्म लेने वाले पैसों को उनके सुरक्षित ठिकानों तक पहुँचाया  जा सके | यह नेक काम भ्रष्टाचारी गण कर भी चुके होंगे | यह कितनी विचित्र बात है कि राष्ट्रिय संपदा के लूटमार  को प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी गण मात्र कर चोरी के दायरे तक ही सीमित कर रहे हैं | ऐसे में ईमानदार प्रधानमंत्री कि नेक नीयति पर सवाल उठाना लाजिमी है..