Sunday, February 7, 2010
''आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री''
अंततः ,भारत सरकार ने पकिस्तान के समक्ष वार्ता की पेशकश कर ही दी | अब यह अमेरिकी दबाव का नतीजा है या फिर, प्रधानमंत्री की घुटना -टेक नीति का परिणाम है | इस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है | किन्तु,यह आतंकवाद और पाकिस्तान के समक्ष भारत का सीधा आत्मसमर्पण है | पिछले लोकसभा चुनाव में आडवाणी ने यह मुद्दा जोर शोर से उठाया था कि मनमोहन सिंह जी एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं | पर देश की जनता ने इस पर भरोसा न करते हुए, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपनी आस्था प्रकट कर दी थी | अब जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है | विश्व- बिरादरी में मनमोहन सिंह ने भारत की प्रतिष्ठा को एक गंभीर क्षति पहुंचाई है | पाकिस्तान ने तो उपहास उड़ाने वाले अंदाज में ये कहा कि यह बैश्विक दबाव का नतीजा है कि भारत ने खुद वार्ता की पेशकश की है | यह कार्य ऐसे समय में किया गया, जब कि पाक. बार -बार यह कह रहा है कि हम मुंबई जैसे एक और हमले न होने की गारंटी नहीं दे सकते हैं वहीँ वह यह, भी कह रहा है कि आतंकवादियों को हम कश्मीर मामले में सहयोग देते रहेंगे | साथ ही कश्मीर पर बातचीत करने की बात भी करता है | अब देशवासी यह देखना चाहेंगे कि मनमोहन आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री हैं या उनमे कुछ माद्दा भी है | होना तो यह चाहिए कि पाकिस्तान की इच्छा के अनुरूप ही प्रधानमंत्री जी को सीधे कश्मीर मुद्दे पर ही बात करनी चाहिए | यह बातचीत संसद के उस प्रस्ताव के आलोक में करना चाहिए | जिसे 1994 में, संसद ने सर्वसम्मति से पारित करते हुए, यह कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और भारत किसी कीमत पर इसको वापस लेगा | यदि,मनमोहन ऐसा करते हैं, तब तो देशवासी, आडवाणी के आरोपों को झूठा मानेंगे | अगर ऐसा नहीं होता है, तब तो आडवाणी जी की बातों को ही देशवासी सत्य मानेंगे| अब,प्रधानमंत्री जी के सामने अग्नि-परीक्षा की स्थिति है | देश की इच्छा है कि वो बेदाग निकलें | अंत, में दिनकर की ये पंक्तियाँ उन्हें स्मरण रखनी चहिये कि -'' सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है, बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'
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