आज स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है |जिसे हम भारत के लोग "राष्ट्रीय युवा दिवस" के रूप में जानते हैं | आज का दिन बड़ा ही गौरवशाली है, ऐसा इस लिए कि आज के ही दिन एक ऐसे योद्धा सन्यासी का इस धरती पर अवतरण हुआ, जिसने इस महान भारत भूमि के प्राचीन अध्यात्मिक तत्वों का अनुसंधान कर के हमें यह बताया कि भारत का पुनरुत्थान धर्म-शक्ति से ही संभव है, पश्चिम के अन्धानुकरण से नहीं | उन्होंने हमें यह भी बताया कि भारत को फिर से महाशक्तिशाली बनाने में सभी आयु-वर्गों के लोगो को सम्मिलित योगदान देना होगा, विशेषतः युवाओं को | तभी हम भारत माता को फिर से उस महिमामयी स्थान पर प्रतिस्थापित कर पाएंगे जहां वो अतीत में विराजमान थी |
स्वामी जी के इन्ही उदात्त विचारों व् संदेशों का चिंतन करते हुए हमने आज के परिदृश्य पर एक नज़र डाली | मैंने पाया कि आज महान भारत वर्ष संक्रमणकाल से गुज़र रहा है | और भारत ही क्यूँ, सारा विश्व ही |
भारत में हम अपने राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दुर्व्यवस्था पाते हैं | उदाहरण के लिए शिक्षा को ही लिया जाये | यद्यपि हमें ज्ञान- विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रो में व्यावहारिक विषयों कि शिक्षा तो दी जाती है, किन्तु उन सबका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है | जबकि प्राचीन शिक्षा-प्रणाली में ऐसी बात नहीं थी | शिक्षा का प्रथम उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह भारत के भावी नागरिकों को राष्ट्र के सांस्कृतिक आदर्शों को हृदयंगम कराये, क्योंकि उसी से वे भारत के सच्चे नागरिक बन सकते हैं | इस परिप्रेक्ष्य में हमारी वर्त्तमान शिक्षा-प्रणाली एकदम असफल रही है | परिणामतः छात्र अपनी सांस्कृतिक जड़ो से, जिनके द्वारा राष्ट्र संगठित था, दूर होते जा रहे हैं | आर्थिक क्षेत्र में भी इसी प्रकार कि दुर्व्यवस्था विद्यमान है | ग़रीबी व भुखमरी दूर करने के हमारे लाख प्रयासों के बावजूद जन-साधारण कि दशा और दिशा बाद से बदतर होती जा रही है | यदा-कदा हमें ऐसे कथन सुनने को मिलते रहते हैं कि "राष्ट्रीय आय में 2% की वृद्धि हुई, 4% की वृद्धि हुई |" हो सकता है कि यह सही हो, पर ग़रीबों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता क्योंकि वृद्धि का एक छोटा-सा अंश ही उन तक पहुँच पता है |
जब तक उनकी आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक अवस्थाओं में उन्नति नहीं होगी, देश के लिए कोई आशा नहीं है | इसे कारगर करने के लिए केवल सरकार का मुंह देखने से नहीं चलेगा, बल्कि,समाज के सभी लोगों को एकजुट इस कार्य को अपने हाथों में लेना होगा |धनिक वर्गों को उनकी दशा सुधारने के लिए सामने आना पड़ेगा और उनकी सहायता करनी होगी | इससे केवल जनता का और देश का ही भला नहीं होगा, बल्कि, अप्रत्यक्ष रूप से उनका स्वयं का भला भी होगा | धनिक वर्ग जन-साधारण की सहायता के लिए जितना शीघ्र आगे आयेंगे ,देश के लिए उतना ही अच्छा है |
प्राचीन युग में समाज की संरचना समाजवादी आधार पर हुई थी | सभी से यह आशा की जाती थी कि वह किसी न किसी प्रकार से समाज व राष्ट्र की सेवा करे | इसके साथ ही समाज ने लोगों को जीवन-आनंद लेने के लिए कुछ छूट भी दी थी,किन्तु; कुछ सीमाओं के साथ, जिससे राष्ट्र का जीवन असंतुलित न हो | पर आज तो हम राष्ट्रीय-जीवन में बिलकुल विपरीत धारा पाते हैं | जिससे ऐसी गंभीर समस्याएं उठ खड़ीं हुई है ,जिनका समाधान हम नहीं कर प् रहे हैं | शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, उद्योग, श्रम, और ब्यवसाय के क्षेत्र का जो हाल है, उससे हम सभी भली-भांति परिचित हैं | ये सारे क्षेत्र भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता से विषाक्त हो गए हैं |जहाँ मौलिक अधिकारों की बात तो की जाती है, लेकिन देश के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध नहीं कराया जाता है | राजनीतिक क्षेत्र में तो स्थिति और भी बदतर है | जिसने समूचे राष्ट्रीय-जीवन को अस्त -व्यस्त कर दिया है | राष्ट्रीय दृष्टिकोण में मूलभूत परिवर्तन लाना ही इस महामारी का निदान है | सिर्फ संसद में क़ानून बना कर स्थिति में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता | बदलाव, स्वामी जी के बताये धर्म-मार्ग पर चल कर ही सम्भव है | धर्म से मेरा आशय, कतिपय आडम्बरपूर्ण आस्थाओं से नहीं है, अपितु, आध्यात्मिक तत्वों की प्रत्यक्ष अनुभूति से है | वर्तमान युग की दुर्दशा से रक्षा के लिए आध्यात्मिकता संपन्न एक नए विचार एवं सन्देश की आवश्यकता है | ऐसा सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि, सारे संसार के लिए | इसलिए, मित्रों मैं आपमें से प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि आप व्यक्तिगत रूप से इस पावन कार्य में सक्रिय रूचि लें और साथ ही लोगों की भी भागीदारी सुनिश्चित करें | आप सरकार से ज़्यादा आशा न रखें, क्योंकि वह अकेले विशेष कुछ नहीं कर पाती है | सरकार ने जिन बड़ी बड़ी योजनाओं को स्वीकृत किया है और कानूनों को पारित किया तथा वह भविष्य में जो कुछ भी स्वीकृत और पारित करेगी, उनका क्रियान्वयन तब तक सम्भव नहीं हो सकता, जब तक हम उन्हें नहीं अपनाते हैं |
अतः सरकार की ओर अपलक निहारानें और उसे दोष देने में कोई अच्छाई नहीं है | क्योंकि वह भी आखिर इसी समाज का एक अंग है |आप स्वयं आगे बढिए और इस कार्य को अपनाइए, तब जो भी शासन सत्तारूढ़ होगा, वह अपने आप मार्ग पर आ जायेगा | अतएव, अब समय आ गया है, जब हमें स्वामी जी का अनुसरण करना ही होगा |...
--अनुराग पाण्डेय
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