Wednesday, February 24, 2010

सारा कश्मीर हमारा है

 हमने समझा दोस्त उन्हें,वे दुश्मन हमें समझते हैं ,
नहीं फ़िक्र है उन्हें अमन की,बारम्बार उलझते हैं |
जब-जब हमने हाँथ मिलाया,उनसे सरल दोस्त बनकर,
तब-तब उनने घात किया है,सदा पीठ पीछे हमपर |
नहीं याद है उन्हें इखत्तर,का वह अमर युद्ध-सन्देश |
 जो टकराएगा हमसे,हों जायेगा वह खंडित देश |
क्षमा किया था हमने रण में,धूल चटाने के ही बाद |
यही सोचकर कि अब उन्हें,आएगी बुद्धि,न हों बर्बाद |
पर उनकी तो बुद्धि भ्रष्ट है,चढ़ आये फिर सीमा पर |
फिर ललकार हैं हमको,विगत पराजय विस्मृत कर |
विश्व-शांति अब रहे सुरक्षित,यही सोचकर हम सबने |
संयम से संघर्ष किया है,बलि दी हैं कितनी जानें |
न लो परीक्षा अब वर्ना,इच्छा सुन लो यह जन-जन की|
मिट जाएगी वो झूठी रेखा,वर्षों पूर्व विभाजन की |
सौ करोड़ कंठों का अब यह,एक अनूठा नारा है |
कारगिल से गिलगित तक,सारा कश्मीर हमारा है |
                                                                          साभार,
                                                                          स्वप्न और यथार्थ से
                                                                          रचनाकार-श्री अरविंदपाण्डेय                    

Sunday, February 7, 2010

''आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री''

अंततः ,भारत सरकार ने पकिस्तान के समक्ष वार्ता की पेशकश कर ही दी | अब यह अमेरिकी दबाव का नतीजा है या फिर, प्रधानमंत्री  की घुटना -टेक नीति का परिणाम है | इस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है | किन्तु,यह आतंकवाद और पाकिस्तान के समक्ष भारत का सीधा आत्मसमर्पण है | पिछले लोकसभा चुनाव में आडवाणी ने यह मुद्दा जोर शोर से उठाया था कि मनमोहन सिंह जी एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं | पर देश की जनता ने इस पर भरोसा न करते हुए, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपनी आस्था प्रकट कर दी थी | अब जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है | विश्व- बिरादरी में मनमोहन सिंह ने भारत की प्रतिष्ठा को एक गंभीर क्षति पहुंचाई है | पाकिस्तान ने तो उपहास उड़ाने वाले अंदाज में ये कहा कि यह बैश्विक दबाव का नतीजा है  कि भारत ने खुद वार्ता की पेशकश की है | यह कार्य ऐसे समय में किया गया, जब कि पाक. बार -बार यह कह रहा है कि हम मुंबई जैसे एक और हमले न होने की गारंटी नहीं दे सकते हैं वहीँ वह यह, भी कह रहा है कि आतंकवादियों को हम कश्मीर मामले में सहयोग देते रहेंगे | साथ ही कश्मीर पर बातचीत करने की बात भी करता है | अब देशवासी यह देखना चाहेंगे कि मनमोहन आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री हैं या उनमे कुछ माद्दा भी है | होना तो यह चाहिए कि पाकिस्तान की  इच्छा के अनुरूप ही प्रधानमंत्री जी को सीधे कश्मीर मुद्दे पर ही बात करनी चाहिए | यह बातचीत संसद के उस प्रस्ताव के आलोक में करना चाहिए | जिसे 1994 में, संसद ने सर्वसम्मति से पारित करते हुए, यह कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और भारत किसी कीमत पर इसको वापस लेगा | यदि,मनमोहन ऐसा करते हैं, तब तो देशवासी, आडवाणी के आरोपों को झूठा मानेंगे | अगर ऐसा नहीं होता है, तब तो आडवाणी जी की बातों को ही देशवासी सत्य मानेंगे| अब,प्रधानमंत्री जी के सामने अग्नि-परीक्षा की स्थिति है | देश की इच्छा है कि वो बेदाग निकलें | अंत, में दिनकर की ये पंक्तियाँ उन्हें स्मरण रखनी चहिये कि -'' सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है, बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'

Tuesday, January 26, 2010

प्रजातंत्र को प्रजातंत्र ही रहने दो

                                        '' जनतंत्र, - गणतंत्र , प्रजातंत्र , 
                                           कुछ भी बोलो,आज सब बेमानी है |
                                           बीते हुए दिनों की,भूली हुई, दुखद कहानी  है |
                                           मै सह रहा था और कह रहा था ,
                                           प्रजातंत्र के नाम को,यूँ न बदनाम करो ,
                                           इसकी इज्जत को मत नीलाम करो |
                                           अपराधी, चोर, उचक्कों को मत संसद,पहुँचाओ ,
                                           प्रजातंत्र को प्रजातंत्र ही रहने दो ,
                                           इसे गुंडा-तंत्र न बना डालो | ''\

Saturday, January 23, 2010

आई.पी.एल. मालिकों का सही फैसला


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आज  ''सारिम अन्ना'' का लेख ' खेल भावना के खिलाफ', पढने को मिला | इस लेख में जो भी विचार व्यक्त किये हैं, मै समझता हूँ कि यह एक पक्षीय विचार है | जैसा कि सभी जानते है कि पाक सरकार की नीति में यह बात शामिल रहती है कि भारत और उसके नागरिकों को आतंकवाद की सहायता से निरंतर परेशान किये रहना है | पाक सरकार द्वारा पोषित पल्लवित और संरक्षित आतंकियों की एक टीम, अवैध रूप से देश की सीमाओं को पार कर के यहाँ आती  हैं तथा बम और गोलियां बरसा कर, निरीह और मासूम देशवासियों के साथ खून की होलियाँ  खेलती हैं | हमारे सम्मानित धर्मस्थलों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर धमाके कर के उन्हें ध्वस्त करती  हैं | ऐसे में उनकी दूसरी टीम  के साथ हम क्रिकेट खेल कर आपसी सौहार्द को कैसे कायम कर पाएंगे ? पाकिस्तान की इस दोहरी नीति को देशवासी अब सहन नहीं करेंगे |  यह आरोप कि इस फैसले में भारत के विदेश मंत्रालय की भूमिका है,बिलकुल वाहियात बात है | फिर , यदि इस आरोप को सही भी मान लिया जाय, तब तो विदेश मंत्रालय साधुवाद की पात्र है | ऐसे फैसलों के साथ सभी देशवासी  सरकार के साथ हैं | पाक को अब यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि इस तरह की कुटिल नीतियों का भारत जबरदस्त प्रतिकार करेगा | वैसे भी आये दिन हम क्रिकेट मैचों के दौरान देखते हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेटर भारतीय क्रिकेटरों के साथ नफ़रत की भावना के साथ पेश आते हैं | फिर, हमें आई.पी.एल. ;२' को भी याद रखना होगा | जिसमे खुद पाक सरकार ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों को आई.पी.एल. में खेलने से मना कर दिया था | हम शांति के उपासक जरूर हैं | पर अब यह एक तरफ़ा नहीं होगा | हमारा एक सिद्धांत यह भी है कि ''शठे शाठ्यम समाचरेत'' | अंत में भारत सरकार को भी यह याद रखना चाहिए कि '' क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दन्तहीन, विषहीन, विनीत सरल हो'' |--अनुराग पाण्डेय

भारत पर संभावित आतंकी हमला

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भारत सरकार ने 26 /11  जैसे एक और हमले की चेतावनी  जारी की है | पाकिस्तान से जिस तरह की प्रतिक्रिया की  उम्मीद थी, बिलकुल वही सामने आई | पाक के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने कहा कि उनकी सरकार 26 /11 जैसा  एक और हमला भारत में न होने की गारंटी नहीं ले सकता | प्रथम दृष्टया यह बात उचित ही जान पड़ती है | क्योंकि पाक खुद आतंकवाद से पीड़ित है | किन्तु, गहराई से विचार करने पर मालूम पड़ता है कि भारत व पाकिस्तान में आतंकी हमलों के लिए अलग -अलग कारण जिम्मेदार हैं भारत पर होने वाले हमले तो पाक सरकार और आतंकी संगठनो की सुनियोजित साजिश है | जिसका मिशन भारत को नष्ट कर देना  है| पर पाक में होने वाले आतंकी हमले तो उनका आपसी अंतरद्वंद मात्र है |जिसकी वजह, विश्व शक्तियों के दबाव में आ कर पाकिस्तान द्वारा अपने पोषित आतंकियों पर मजबूरी में किये जा रहे जा हमले हैं | वस्तुतः, पाक सरकार की आतंकियों के बिरुद्ध कार्यवाई महज दिखावा है | वो आतंकियों को जड़-मूल से समाप्त कर देने के उद्देश्य से उन पर हमले नहीं करता, बल्कि , अमेरिका से डालर और अत्याधुनिक शस्त्रास्तों को प्राप्त करने के लिए दुनिया की आखों में धूल झोंकता है | वैसे भी वहां की सरकार तो कठपुतली जैसी है | क्योंकि, पाक में सत्ता किसी एक जगह केन्द्रित न हो कर चार  'ए'  में विकेन्द्रित  है | ये चार हैं - आतंकवादी, आर्मी, आई.एस.आई . और अमेरिका | अतः भारत को पाक सरकार या अमेरिका  से किसी भी तरह के सहयोग की अपेक्षा न रखते हुए स्वयं को महाशक्तिशाली बनाने की दिशा में तेजी से कार्य करना होगा | किसी अन्य पर आश्रित रहने वाला देश अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर सकता | हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाक से भी ज्यादा बड़ा खतरा भारत के लिए 'चीन' है | जो चारों ओर से हमारी घेराबंदी कर रहा है | भारत के लिए निरंतर सतर्कता और शक्ति-अर्जन ही सुरक्षा एक मात्र विकल्प है | हमें शक्ति की उपासना करनी ही होगी | क्योंकि, इसी से हम विकास और सुरक्षा, दोनों की रक्षा का पाएंगे | रही बात आतंकी हमलों से स्थाई बचाव की, तो इसका एकमात्र उपाय इजराइली तर्ज पर, पाक में घुस कर आतंकी फैक्ट्रियों को जड़ से नष्ट करना ही एक मात्र उपाय है| हमें , हमले होने पर अमेरिका की ओर देखने की अपनी कायराना  प्रवृत्ति का परित्याग  करना होगा | यही , वो तरीका है जिससे हम स्वाभिमान पूर्वक इस विश्व बिरादरी में अपना स्थान बनाये  रख  सकते  हैं | समापन से पहले श्री दिनकर की निम्न पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं - ''
         
          ''सहनशीलता, क्षमा दया को, तभी पूजता जग है | बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'' 

 --अनुराग पाण्डेय