Monday, August 9, 2010

Ma vindhavasini




--अनुराग पाण्डेय
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Sunday, June 20, 2010

अग्नि वाणी: नक्सली और सरकार

अग्नि वाणी: नक्सली और सरकार

--अनुराग पाण्डेय

नक्सली और सरकार

पिछले कई दिनों से नक्सलियों और सरकार के बीच जंग छिड़ी हुई है | नक्सली सरकारी नीतियों और सिद्धांतों के बिरुद्ध हैं |उनका मानना है कि हमारी लड़ाई सामाजिक और आर्थिक असमानता के बिरुद्ध एक जंग है |हम ब्यक्ति-२ के बीच एक दीवार के रूप में खड़ी ''प्राइवेट प्रापर्टी'' को ख़त्म करना चाहते हैं | असल, में कम्युनिस्ट विचार-धारा,समाज कि इस विडंबना को देखना पसंद नहीं करता कि एक जूता बनाने वाला नंगे पैर रहे, मकान बनाने वाले खुले आसमान के नीचे रहने को विवश हों और पूंजीपति वर्ग ऐशोआराम
का जीवन जियें| लोकतंत्र में सरकारी नीतियां भी समाज कि इन्ही समस्यायों को दूर करने के लिए बनाई जाती हैं | किन्तु, धरातल पर दोनों के ही प्रयास आज असफल हैं | आज भी देश में, 40 करोड़ नागरिकों कि आय एक डालर से भी कम है | इस देश में, करोड़ों लोग भूखे पेट ही सो जाते हैं | किसी लोकतान्त्रिक देश के लिए, यह एक शर्म कि बात होनी चाहिए कि, उसके देश में कोई भूख से मर जाये | आज इस देश को कई तरह कि चुनौतियों का सामना करना है | यह समय नक्सलियों से रस्साकस्सी करने का नहीं है | सरकार को चाहिए कि नक्सलियों से वार्ता कर के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास का कार्य प्राथमिकता के आधार करते हुए, जन समस्याओं के समाधान में रूचि ले | ऊल जुलूल सरकारी नीतियों से देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के विद्रोह उत्पन्न हों सकते हैं | अब समय आ गया है कि राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ सत्ता सुख में ही लीं न रहे | आज देश को बिजली, पानी और सस्ते अनाजों कि जरुरत है |  नीतियों के क्रियान्यवन कि निगरानी के लिए, सरकार को आज एक ठोस  तंत्र का निर्माण करना चाहिए | तभी, इस देश में अमन चैन का वातावरण तैयार  हों सकता है |


--अनुराग पाण्डेय

Wednesday, June 9, 2010

अमेरिका से सामरिक दोस्ती की प्रासंगिकता

कम्युनिस्ट और मुसलमानों के साथ ही भारत के अनेक लोग अमेरिका से ठोस सम्बन्ध बनाने के विरुद्ध रहते हैं | इनका कहना है कि अमेरिका विश्वसनीय नहीं है | ये लोग 71 के युद्ध का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा रहता है | अन्य उदाहरण भी दिए जाते हैं| किन्तु,यह आधा सच है | असल, में स्वतंत्रता के बाद हमारे हुक्मरानों ने कुछ ऐसे अतार्किक निर्णय लिए,जो अमेरिका सहित देश के विपक्ष और मीडिया को भी असहज करने वाले थे | चाहे चीन को मान्यता देने का प्रश्न  हों या फिर तिब्बत को उपहार स्वरूप चीन को प्रदान करने की बात हों |ये दोनों बातें अमेरिका को असहज करने वाले थे | इसी क्रम में 1956 में हंगरी के स्वतन्त्र चुनाव के मामले में, भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया जा सकता है | जब पंडित नेहरु की विदेश नीति की आलोचना जितनी अमेरिका ने  नहीं की, उतनी भारतीय जनता ने की थी | संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हंगरी में स्वतन्त्र चुनाव के प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करना किसी के भी समझ से परे था | ऐसे में अमेरिका पर अनर्गल आरोप लगाना, सही प्रतीत नहीं होता | किसी से ठोस  रिश्ते बनाना हमेशा द्विपक्षीय संबंधो पर आधारित होता है | आज देश पर कई तरह के खतरे हैं | पड़ोस में अशांति फ़ैलाने वाले देश हैं |जिनका मिशन भारत को नष्ट-भ्रष्ट करना है | ऐसे में, किसी शक्तिशाली देश से अत्यधिक मधुर सम्बन्ध बनाना समय की मांग है |इस मामले अमेरिका से बेहतर और कोई देश नहीं है | वह लोकतंत्र का हिमायती है | वो हमारे धार्मिक मूल्यों को अत्यधिक महत्त्व देता है |आज अमेरिका आर्थिक संकट में है | ऐसे में हम उसकी सहायता कर के अपने संबंधों को एक नया आयाम दे सकते हैं |
--अनुराग पाण्डेय

Wednesday, February 24, 2010

सारा कश्मीर हमारा है

 हमने समझा दोस्त उन्हें,वे दुश्मन हमें समझते हैं ,
नहीं फ़िक्र है उन्हें अमन की,बारम्बार उलझते हैं |
जब-जब हमने हाँथ मिलाया,उनसे सरल दोस्त बनकर,
तब-तब उनने घात किया है,सदा पीठ पीछे हमपर |
नहीं याद है उन्हें इखत्तर,का वह अमर युद्ध-सन्देश |
 जो टकराएगा हमसे,हों जायेगा वह खंडित देश |
क्षमा किया था हमने रण में,धूल चटाने के ही बाद |
यही सोचकर कि अब उन्हें,आएगी बुद्धि,न हों बर्बाद |
पर उनकी तो बुद्धि भ्रष्ट है,चढ़ आये फिर सीमा पर |
फिर ललकार हैं हमको,विगत पराजय विस्मृत कर |
विश्व-शांति अब रहे सुरक्षित,यही सोचकर हम सबने |
संयम से संघर्ष किया है,बलि दी हैं कितनी जानें |
न लो परीक्षा अब वर्ना,इच्छा सुन लो यह जन-जन की|
मिट जाएगी वो झूठी रेखा,वर्षों पूर्व विभाजन की |
सौ करोड़ कंठों का अब यह,एक अनूठा नारा है |
कारगिल से गिलगित तक,सारा कश्मीर हमारा है |
                                                                          साभार,
                                                                          स्वप्न और यथार्थ से
                                                                          रचनाकार-श्री अरविंदपाण्डेय                    

Sunday, February 7, 2010

''आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री''

अंततः ,भारत सरकार ने पकिस्तान के समक्ष वार्ता की पेशकश कर ही दी | अब यह अमेरिकी दबाव का नतीजा है या फिर, प्रधानमंत्री  की घुटना -टेक नीति का परिणाम है | इस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है | किन्तु,यह आतंकवाद और पाकिस्तान के समक्ष भारत का सीधा आत्मसमर्पण है | पिछले लोकसभा चुनाव में आडवाणी ने यह मुद्दा जोर शोर से उठाया था कि मनमोहन सिंह जी एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं | पर देश की जनता ने इस पर भरोसा न करते हुए, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपनी आस्था प्रकट कर दी थी | अब जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है | विश्व- बिरादरी में मनमोहन सिंह ने भारत की प्रतिष्ठा को एक गंभीर क्षति पहुंचाई है | पाकिस्तान ने तो उपहास उड़ाने वाले अंदाज में ये कहा कि यह बैश्विक दबाव का नतीजा है  कि भारत ने खुद वार्ता की पेशकश की है | यह कार्य ऐसे समय में किया गया, जब कि पाक. बार -बार यह कह रहा है कि हम मुंबई जैसे एक और हमले न होने की गारंटी नहीं दे सकते हैं वहीँ वह यह, भी कह रहा है कि आतंकवादियों को हम कश्मीर मामले में सहयोग देते रहेंगे | साथ ही कश्मीर पर बातचीत करने की बात भी करता है | अब देशवासी यह देखना चाहेंगे कि मनमोहन आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री हैं या उनमे कुछ माद्दा भी है | होना तो यह चाहिए कि पाकिस्तान की  इच्छा के अनुरूप ही प्रधानमंत्री जी को सीधे कश्मीर मुद्दे पर ही बात करनी चाहिए | यह बातचीत संसद के उस प्रस्ताव के आलोक में करना चाहिए | जिसे 1994 में, संसद ने सर्वसम्मति से पारित करते हुए, यह कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और भारत किसी कीमत पर इसको वापस लेगा | यदि,मनमोहन ऐसा करते हैं, तब तो देशवासी, आडवाणी के आरोपों को झूठा मानेंगे | अगर ऐसा नहीं होता है, तब तो आडवाणी जी की बातों को ही देशवासी सत्य मानेंगे| अब,प्रधानमंत्री जी के सामने अग्नि-परीक्षा की स्थिति है | देश की इच्छा है कि वो बेदाग निकलें | अंत, में दिनकर की ये पंक्तियाँ उन्हें स्मरण रखनी चहिये कि -'' सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है, बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'

Tuesday, January 26, 2010

प्रजातंत्र को प्रजातंत्र ही रहने दो

                                        '' जनतंत्र, - गणतंत्र , प्रजातंत्र , 
                                           कुछ भी बोलो,आज सब बेमानी है |
                                           बीते हुए दिनों की,भूली हुई, दुखद कहानी  है |
                                           मै सह रहा था और कह रहा था ,
                                           प्रजातंत्र के नाम को,यूँ न बदनाम करो ,
                                           इसकी इज्जत को मत नीलाम करो |
                                           अपराधी, चोर, उचक्कों को मत संसद,पहुँचाओ ,
                                           प्रजातंत्र को प्रजातंत्र ही रहने दो ,
                                           इसे गुंडा-तंत्र न बना डालो | ''\

Saturday, January 23, 2010

आई.पी.एल. मालिकों का सही फैसला


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आज  ''सारिम अन्ना'' का लेख ' खेल भावना के खिलाफ', पढने को मिला | इस लेख में जो भी विचार व्यक्त किये हैं, मै समझता हूँ कि यह एक पक्षीय विचार है | जैसा कि सभी जानते है कि पाक सरकार की नीति में यह बात शामिल रहती है कि भारत और उसके नागरिकों को आतंकवाद की सहायता से निरंतर परेशान किये रहना है | पाक सरकार द्वारा पोषित पल्लवित और संरक्षित आतंकियों की एक टीम, अवैध रूप से देश की सीमाओं को पार कर के यहाँ आती  हैं तथा बम और गोलियां बरसा कर, निरीह और मासूम देशवासियों के साथ खून की होलियाँ  खेलती हैं | हमारे सम्मानित धर्मस्थलों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर धमाके कर के उन्हें ध्वस्त करती  हैं | ऐसे में उनकी दूसरी टीम  के साथ हम क्रिकेट खेल कर आपसी सौहार्द को कैसे कायम कर पाएंगे ? पाकिस्तान की इस दोहरी नीति को देशवासी अब सहन नहीं करेंगे |  यह आरोप कि इस फैसले में भारत के विदेश मंत्रालय की भूमिका है,बिलकुल वाहियात बात है | फिर , यदि इस आरोप को सही भी मान लिया जाय, तब तो विदेश मंत्रालय साधुवाद की पात्र है | ऐसे फैसलों के साथ सभी देशवासी  सरकार के साथ हैं | पाक को अब यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि इस तरह की कुटिल नीतियों का भारत जबरदस्त प्रतिकार करेगा | वैसे भी आये दिन हम क्रिकेट मैचों के दौरान देखते हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेटर भारतीय क्रिकेटरों के साथ नफ़रत की भावना के साथ पेश आते हैं | फिर, हमें आई.पी.एल. ;२' को भी याद रखना होगा | जिसमे खुद पाक सरकार ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों को आई.पी.एल. में खेलने से मना कर दिया था | हम शांति के उपासक जरूर हैं | पर अब यह एक तरफ़ा नहीं होगा | हमारा एक सिद्धांत यह भी है कि ''शठे शाठ्यम समाचरेत'' | अंत में भारत सरकार को भी यह याद रखना चाहिए कि '' क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दन्तहीन, विषहीन, विनीत सरल हो'' |--अनुराग पाण्डेय

भारत पर संभावित आतंकी हमला

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भारत सरकार ने 26 /11  जैसे एक और हमले की चेतावनी  जारी की है | पाकिस्तान से जिस तरह की प्रतिक्रिया की  उम्मीद थी, बिलकुल वही सामने आई | पाक के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने कहा कि उनकी सरकार 26 /11 जैसा  एक और हमला भारत में न होने की गारंटी नहीं ले सकता | प्रथम दृष्टया यह बात उचित ही जान पड़ती है | क्योंकि पाक खुद आतंकवाद से पीड़ित है | किन्तु, गहराई से विचार करने पर मालूम पड़ता है कि भारत व पाकिस्तान में आतंकी हमलों के लिए अलग -अलग कारण जिम्मेदार हैं भारत पर होने वाले हमले तो पाक सरकार और आतंकी संगठनो की सुनियोजित साजिश है | जिसका मिशन भारत को नष्ट कर देना  है| पर पाक में होने वाले आतंकी हमले तो उनका आपसी अंतरद्वंद मात्र है |जिसकी वजह, विश्व शक्तियों के दबाव में आ कर पाकिस्तान द्वारा अपने पोषित आतंकियों पर मजबूरी में किये जा रहे जा हमले हैं | वस्तुतः, पाक सरकार की आतंकियों के बिरुद्ध कार्यवाई महज दिखावा है | वो आतंकियों को जड़-मूल से समाप्त कर देने के उद्देश्य से उन पर हमले नहीं करता, बल्कि , अमेरिका से डालर और अत्याधुनिक शस्त्रास्तों को प्राप्त करने के लिए दुनिया की आखों में धूल झोंकता है | वैसे भी वहां की सरकार तो कठपुतली जैसी है | क्योंकि, पाक में सत्ता किसी एक जगह केन्द्रित न हो कर चार  'ए'  में विकेन्द्रित  है | ये चार हैं - आतंकवादी, आर्मी, आई.एस.आई . और अमेरिका | अतः भारत को पाक सरकार या अमेरिका  से किसी भी तरह के सहयोग की अपेक्षा न रखते हुए स्वयं को महाशक्तिशाली बनाने की दिशा में तेजी से कार्य करना होगा | किसी अन्य पर आश्रित रहने वाला देश अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर सकता | हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाक से भी ज्यादा बड़ा खतरा भारत के लिए 'चीन' है | जो चारों ओर से हमारी घेराबंदी कर रहा है | भारत के लिए निरंतर सतर्कता और शक्ति-अर्जन ही सुरक्षा एक मात्र विकल्प है | हमें शक्ति की उपासना करनी ही होगी | क्योंकि, इसी से हम विकास और सुरक्षा, दोनों की रक्षा का पाएंगे | रही बात आतंकी हमलों से स्थाई बचाव की, तो इसका एकमात्र उपाय इजराइली तर्ज पर, पाक में घुस कर आतंकी फैक्ट्रियों को जड़ से नष्ट करना ही एक मात्र उपाय है| हमें , हमले होने पर अमेरिका की ओर देखने की अपनी कायराना  प्रवृत्ति का परित्याग  करना होगा | यही , वो तरीका है जिससे हम स्वाभिमान पूर्वक इस विश्व बिरादरी में अपना स्थान बनाये  रख  सकते  हैं | समापन से पहले श्री दिनकर की निम्न पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं - ''
         
          ''सहनशीलता, क्षमा दया को, तभी पूजता जग है | बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'' 

 --अनुराग पाण्डेय

Tuesday, January 12, 2010

भारत के पुनर्गठन का समय


                 आज स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है |जिसे हम भारत के लोग "राष्ट्रीय युवा दिवस" के रूप में जानते हैं | आज का दिन बड़ा ही गौरवशाली है, ऐसा इस लिए कि आज के ही दिन एक ऐसे योद्धा सन्यासी का इस धरती पर अवतरण हुआ, जिसने इस महान भारत भूमि के प्राचीन अध्यात्मिक तत्वों का अनुसंधान कर के हमें यह बताया कि भारत का पुनरुत्थान  धर्म-शक्ति से ही संभव है, पश्चिम के अन्धानुकरण से नहीं | उन्होंने हमें यह भी बताया कि भारत को फिर से महाशक्तिशाली बनाने में सभी आयु-वर्गों के लोगो को सम्मिलित योगदान देना होगा, विशेषतः युवाओं को | तभी हम भारत माता को फिर से उस महिमामयी स्थान पर प्रतिस्थापित कर पाएंगे जहां वो अतीत में विराजमान थी |
स्वामी जी के इन्ही उदात्त विचारों व् संदेशों का चिंतन करते हुए हमने आज के परिदृश्य पर एक नज़र डाली | मैंने पाया कि आज महान भारत वर्ष संक्रमणकाल से गुज़र रहा है | और भारत ही क्यूँ, सारा विश्व ही |
भारत  में हम अपने राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दुर्व्यवस्था पाते हैं | उदाहरण के लिए शिक्षा को ही लिया जाये | यद्यपि हमें ज्ञान- विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रो में व्यावहारिक विषयों कि शिक्षा तो दी जाती है, किन्तु उन सबका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है | जबकि प्राचीन शिक्षा-प्रणाली में ऐसी बात नहीं थी | शिक्षा का प्रथम उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह भारत के भावी नागरिकों को राष्ट्र के सांस्कृतिक आदर्शों को हृदयंगम कराये, क्योंकि उसी से वे भारत के सच्चे नागरिक बन सकते हैं | इस परिप्रेक्ष्य में हमारी वर्त्तमान शिक्षा-प्रणाली एकदम असफल रही है | परिणामतः छात्र अपनी सांस्कृतिक जड़ो से, जिनके द्वारा राष्ट्र संगठित था, दूर होते जा रहे हैं | आर्थिक क्षेत्र में भी इसी प्रकार कि दुर्व्यवस्था विद्यमान है | ग़रीबी व भुखमरी दूर करने के हमारे लाख प्रयासों के बावजूद जन-साधारण कि दशा और दिशा बाद से बदतर होती जा रही है | यदा-कदा हमें ऐसे कथन सुनने को मिलते रहते हैं कि "राष्ट्रीय आय में 2% की वृद्धि हुई, 4% की वृद्धि हुई |" हो सकता है कि यह सही हो, पर ग़रीबों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता क्योंकि वृद्धि का एक छोटा-सा अंश ही उन तक पहुँच पता है |
जब तक उनकी आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक अवस्थाओं में उन्नति नहीं होगी, देश के लिए कोई आशा नहीं है | इसे कारगर करने के लिए केवल सरकार का मुंह देखने से नहीं चलेगा, बल्कि,समाज के सभी लोगों को एकजुट इस कार्य को अपने हाथों में लेना होगा |धनिक वर्गों को उनकी दशा सुधारने के लिए सामने आना पड़ेगा और उनकी सहायता करनी होगी | इससे केवल जनता का और देश का ही भला नहीं होगा, बल्कि, अप्रत्यक्ष रूप से उनका स्वयं का भला भी होगा | धनिक वर्ग जन-साधारण की सहायता के लिए जितना शीघ्र आगे आयेंगे ,देश के लिए उतना ही अच्छा है |
प्राचीन युग में समाज की संरचना समाजवादी आधार पर हुई थी | सभी से यह आशा की जाती थी कि वह किसी न किसी प्रकार से समाज व राष्ट्र की सेवा करे | इसके साथ ही समाज ने लोगों को जीवन-आनंद लेने के लिए कुछ छूट भी दी थी,किन्तु; कुछ सीमाओं के साथ, जिससे राष्ट्र का जीवन असंतुलित न हो | पर आज तो हम राष्ट्रीय-जीवन में बिलकुल  विपरीत धारा पाते हैं | जिससे ऐसी गंभीर समस्याएं उठ खड़ीं हुई है ,जिनका समाधान हम नहीं कर प् रहे हैं | शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, उद्योग, श्रम, और ब्यवसाय के क्षेत्र का जो हाल है, उससे हम सभी भली-भांति परिचित हैं | ये सारे क्षेत्र भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता से विषाक्त हो गए हैं |जहाँ मौलिक अधिकारों की बात तो की जाती है, लेकिन देश के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध नहीं कराया जाता है | राजनीतिक क्षेत्र में तो स्थिति और भी बदतर है | जिसने समूचे राष्ट्रीय-जीवन को अस्त -व्यस्त कर दिया है | राष्ट्रीय दृष्टिकोण में मूलभूत परिवर्तन लाना ही इस महामारी का निदान है | सिर्फ संसद में क़ानून बना कर स्थिति में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता | बदलाव,  स्वामी जी के बताये  धर्म-मार्ग पर चल कर ही सम्भव है | धर्म से मेरा आशय, कतिपय आडम्बरपूर्ण आस्थाओं से नहीं है, अपितु, आध्यात्मिक तत्वों की प्रत्यक्ष अनुभूति से है | वर्तमान युग की दुर्दशा से रक्षा के लिए आध्यात्मिकता संपन्न एक नए विचार एवं सन्देश की आवश्यकता है | ऐसा सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि, सारे संसार के लिए | इसलिए, मित्रों मैं आपमें से प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि आप व्यक्तिगत रूप से इस पावन कार्य में सक्रिय रूचि लें और साथ ही लोगों की भी भागीदारी सुनिश्चित करें | आप सरकार से ज़्यादा आशा न रखें, क्योंकि वह अकेले विशेष कुछ नहीं कर पाती है | सरकार ने जिन बड़ी बड़ी योजनाओं को स्वीकृत किया है और कानूनों को पारित किया तथा वह भविष्य में  जो कुछ भी स्वीकृत और पारित करेगी, उनका क्रियान्वयन तब तक सम्भव नहीं हो सकता, जब तक हम उन्हें नहीं अपनाते हैं |
अतः सरकार की ओर अपलक निहारानें और उसे दोष देने में कोई अच्छाई नहीं है | क्योंकि वह भी आखिर इसी समाज का एक अंग है |आप स्वयं आगे बढिए और इस कार्य को अपनाइए, तब जो भी शासन सत्तारूढ़ होगा, वह अपने आप मार्ग पर आ जायेगा | अतएव, अब समय आ गया है,  जब हमें स्वामी जी का अनुसरण करना ही होगा |...

--अनुराग पाण्डेय