Saturday, September 10, 2011

3 करोड़ 20 लाख रु.की लागत से विन्ध्याचल में महायज्ञ का आयोजन



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विन्ध्याचल के पश्चिम में स्थित शिवपुर में, ३ करोड़ २० लाख रु.की लागत से होने वाले एक  महायज्ञ की चर्चा आम लोगों में खूब हो रही है | बहुजन-हिताय, इस यज्ञ का उद्देश्य बताया जा रहा है |यह यज्ञ पिछले ४ अप्रैल से शुरू हो कर २२ जून तक चलेगा |
ज्ञात हो कि इस यज्ञ में २००० टीना शुद्ध देशी घी ,50 टन गुड़,25 टन मेवा और 12 लाख नारियल का प्रयोग किया जा रहा है | यज्ञकर्ता हैं , ब्रह्म गुरु,अवधूत भगवान हनुमान दास जी महाराज |
जिस शिवपुर में इस यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है ,वहां की कुल जनसंख्या लगभग 5 हजार है |जिसमें लगभग 70 फ़ीसदी संख्या ऐसे लोगों की है ,जो गरीबी के दायरे में आते हैं |
अब,सवाल यह उठता है कि जिस क्षेत्र के अधिसंख्य लोगों के सामने गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी, आवास-विहीनता,  शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं विद्यमान हों,उस क्षेत्र में इतने ज्यादा पैसे से यज्ञ का आयोजन करवाना क्या जायज है ? आम लोगों और बुद्धिजीवियों की राय इस पर अलग-अलग हो सकती है|किन्तु,यह मूल प्रश्न अपने स्थान पर कायम है कि क्या इसे वास्तव में धर्म-सम्मत माना जाना चाहिए ?
वेद और पुराणों के रचयिता ,भगवान वेदव्यास जी का कहना है | अष्टादश पुराणानाम व्यासस्य वचनं द्वय,परोपकार पुण्याय,पापाय परपीडनं. इसी तरह मानसकार तुलसी बताते है कि  परहित सरिस धर्म नहीं भाई ,परपीड़ा सम नहि अधमाई |
स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि आत्मवत सर्वभूतेषु - क्या यह वाक्य मात्र पोथी में निबद्ध रखने के लिए है ? जो लोग गरीबों को रोटी का एक टुकड़ा नहीं दे सकते ,वे फिर मुक्ति क्या देंगे |आगे कहते हैं कि धर्म की बात सुनानी हो तो पहले देश के लोगों के पेट और छत की चिंता को दूर करना चाहिए | केवल व्याख्यान देने और यज्ञ करने से कुछ नहीं होने वाला| पहले, रोटी और आवास ,फिर धर्म की बातें और आयोजन |
-- मेरा मानना है कि कोई भी सच्चा धार्मिक और अभिनव मनुष्य इस तरह के धार्मिक आयोजनों का समर्थन नहीं करेगा | फिर, सवाल यह भी है कि इतने रुपयों की व्यवस्था कहाँ से हुई ? क्या भक्तों द्वारा चंदे में दी गई है | यदि हाँ ,तो उसका हिसाब -किताब, लोगों को बताया जाना चाहिए |
इस यज्ञ से जिन धार्मिक उपलब्द्धियों को पाया जाना है | उसमे ये लोग कहाँ तक सफल होंगे ,यह तो भविष्य के गर्भ में है |किन्तु, एक बात तय है कि इस महायज्ञ से उस क्षेत्र के गरीबों का उपहास उडाया जा रहा है | जो कि धर्म- विरुद्ध है | इन पैसों का इस्तेमाल यदि शिवपुर में गरीबी उन्मूलन और नागरिक सुविधाओं को सुनिचित करने में किया जाता,तो ज्यादा बेहतर होता ||

Friday, May 27, 2011

punjab-kesari

Better late than never.

--अनुराग पाण्डेय

Sunday, February 20, 2011

आज का ''युधिष्ठिर '' ; और यक्ष -प्रश्न

यक्ष-प्रश्न;-- कैंडीडेट युधिष्ठिर ,राजन | प्रश्न यक्ष का जारी 
कौन  हवा से तेज ,कौन है  यहाँ भूमि से भारी ||
किसे मारता तब लीडर ,बनता धन का अधिकारी |
हर चुनाव में ,अंत समय ,क्या होता विस्मयकारी ||

युधिष्ठिर का उत्तर ,--झूठ हवा से तेज ,वोट का मूल्य भूमि से भारी |
आत्मा मारा तब लीडर ,बनता धन का अधिकारी ||
बारम्बार भ्रष्ट को चुनना ,सचमुच विस्मयकारी |
उत्तर सुनकर  'यक्ष ' गिर पड़ा, मूर्छा अब तक जारी ||










--अनुराग पाण्डेय

Tuesday, February 15, 2011

अग्नि वाणी: Yogeshvar Shree Krishna

अग्नि वाणी: Yogeshvar Shree Krishna

--अनुराग पाण्डेय

Yogeshvar Shree Krishna


Wherever there is Krisha,the master of all mystics,and wherever there is Arjuna,the supreme archer,there will also certainly be opulence,victory,extraordinary power,and morality.That is my opinion.

--अनुराग पाण्डेय
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Thursday, February 3, 2011

ईमानदार प्रधानमंत्री की लाचारी

सामान्यतः देश में  यह धारणा प्रबल है कि हमारे प्रधानमंत्री साहब बड़े ईमानदार और नेक-दिल इन्सान हैं |सन 90 के आसपास ,जब वे देश के वित्तमंत्री थे,उस समय अर्थव्यवस्था की स्थिति बड़ी दयनीय हालत में थी| देश का संचित सोना भी गिरवी रख दिया गया था |उस विषम स्थिति से देश को सफलतापूर्वक बाहर निकालने का श्रेय इन्ही मनमोहन सिंह को दिया जाता है |अब सवाल यह उठता है कि इतने सक्षम व्यक्ति  आज इतने लाचार क्यों हैं?  टू जी स्पेक्ट्रम,आदर्श हाऊसिंग और कॉमनवेल्थ जैसे महाघोटाले इनके कार्यकाल में हो चुके हैं |वर्तमान में इस ईमानदार प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में कितने बेईमान हैं |यह बताना मुश्किल काम है | महज कुछ घोटाले ही सामने आ पाए हैं | कितने और घोटालेबाज जनप्रतिनिधि इनके साथ हैं |यह सामने आना अभी बाकी है |इस ईमानदार प्रधानमंत्री के 5 वर्षीय कार्यकाल में इतनी बड़ी राशि का घोटाला किया जा चुका है,जितना कि पूरे ब्रिटिश राज में भी नहीं किया जा सका था | ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी,अशोक चह्वाण जैसे दिग्गज घोटालेबाज कई वर्षो से इनकी  मंडली  में शोभा पा रहे थे |अभी कुछ दिनों पहले तक मनमोहन  सिंह यही कहते रहे कि कोई घोटाला नहीं हुआ| किन्तु कैग कि रिपोर्ट के बाद इनके स्वर में कुछ बदलाव आया | बावजूद इसके इनके कुछ सिपहसलार कैग कि रिपोर्ट को झुठला देने पर आमादा थे |लेकिन विपक्ष और जनता के दबाव के बाद ही इनकी बोलती बंद हो पाई | अब बहस का विषय यह होना चाहिए की, क्या किसी  व्यक्ति को  ईमानदारी का दावा करने मात्र से ही, ईमानदार मान लेना चाहिए ? जैसा की छद्म- धर्मनिरपेक्षकों को सच का धर्मनिरपेक्ष मान लिया जाता है | इसका जवाब नहीं में ही होना चाहिए | घोटालों की इस महा-विभीषिका के दौर में प्रधानमंत्री के सामने आज अग्नि परीक्षा की स्थिति है |स्विट्जरलैंड  की एक पत्रिका ''स्विट्जर इलस्ट्रेट'' ने 19 नवम्बर, 1991 के अपने अंक में तीसरी दुनिया के अनेकों ऐसे राजनेताओं के खातों का विवरण दिया जिसमें अरबों डॉलर पड़े हुए थे |इन नेताओं में राजीव गाँधी का भी नाम दर्ज था ,जिन्होंने बोफोर्स   के सौदे के बाद मिली दलाली का हिस्सा उस अकाउंट में  जमा  कर रखा था |पत्रिका ने के.जी. बी. के सूत्रों के हवाले से यह भी बताया की सोनिया गाँधी ने अपने नाबालिक बेटे के नाम से स्विस बैंक में एक गुप्त अकाउंट खोल रखा है ,जिसमे 2.5 अरब स्विस फ्रेंक जमा है जो लगभग 2 .2 अरब डॉलर के बराबर है |अगर इस पैसे की गणना आज के दर से की जाय  तो यह रकम 10 हजार करोड़ रु. के बराबर होगी | यह बात 1991 के दौर की है | आशय स्पष्ट है | यदि मनमोहन सिंह वास्तव में एक ईमानदार व्यक्ति हैं |तो वे पहले सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करें |तभी उनके ईमानदार होने की अफवाह को सही माना जायेगा |अन्यथा वो ईमानदारी का दावा करने के लिए स्वतंत्र हैं |
आज के अख़बारों से पता चला कि ए. राजा और उनके कुछ दरबारियों की आज गिरफ्तारी हुई  है |सुनने में लोगों को अच्छा लगा होगा |किन्तु इससे होगा क्या ? कुछ महीनों की नजरबंदी , फिर जमानत | क्योंकि भ्रष्टाचार के बिरुद्ध हमारे कानूनी किताबों में ज्यादा कुछ है नहीं |वैसे भी ये गिरफ्तारियां देर से हुई हैं,ताकि भ्रष्टाचार के गर्भ से जन्म लेने वाले पैसों को उनके सुरक्षित ठिकानों तक पहुँचाया  जा सके | यह नेक काम भ्रष्टाचारी गण कर भी चुके होंगे | यह कितनी विचित्र बात है कि राष्ट्रिय संपदा के लूटमार  को प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी गण मात्र कर चोरी के दायरे तक ही सीमित कर रहे हैं | ऐसे में ईमानदार प्रधानमंत्री कि नेक नीयति पर सवाल उठाना लाजिमी है..

Monday, August 9, 2010

Ma vindhavasini




--अनुराग पाण्डेय
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Sunday, June 20, 2010

अग्नि वाणी: नक्सली और सरकार

अग्नि वाणी: नक्सली और सरकार

--अनुराग पाण्डेय

नक्सली और सरकार

पिछले कई दिनों से नक्सलियों और सरकार के बीच जंग छिड़ी हुई है | नक्सली सरकारी नीतियों और सिद्धांतों के बिरुद्ध हैं |उनका मानना है कि हमारी लड़ाई सामाजिक और आर्थिक असमानता के बिरुद्ध एक जंग है |हम ब्यक्ति-२ के बीच एक दीवार के रूप में खड़ी ''प्राइवेट प्रापर्टी'' को ख़त्म करना चाहते हैं | असल, में कम्युनिस्ट विचार-धारा,समाज कि इस विडंबना को देखना पसंद नहीं करता कि एक जूता बनाने वाला नंगे पैर रहे, मकान बनाने वाले खुले आसमान के नीचे रहने को विवश हों और पूंजीपति वर्ग ऐशोआराम
का जीवन जियें| लोकतंत्र में सरकारी नीतियां भी समाज कि इन्ही समस्यायों को दूर करने के लिए बनाई जाती हैं | किन्तु, धरातल पर दोनों के ही प्रयास आज असफल हैं | आज भी देश में, 40 करोड़ नागरिकों कि आय एक डालर से भी कम है | इस देश में, करोड़ों लोग भूखे पेट ही सो जाते हैं | किसी लोकतान्त्रिक देश के लिए, यह एक शर्म कि बात होनी चाहिए कि, उसके देश में कोई भूख से मर जाये | आज इस देश को कई तरह कि चुनौतियों का सामना करना है | यह समय नक्सलियों से रस्साकस्सी करने का नहीं है | सरकार को चाहिए कि नक्सलियों से वार्ता कर के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास का कार्य प्राथमिकता के आधार करते हुए, जन समस्याओं के समाधान में रूचि ले | ऊल जुलूल सरकारी नीतियों से देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के विद्रोह उत्पन्न हों सकते हैं | अब समय आ गया है कि राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ सत्ता सुख में ही लीं न रहे | आज देश को बिजली, पानी और सस्ते अनाजों कि जरुरत है |  नीतियों के क्रियान्यवन कि निगरानी के लिए, सरकार को आज एक ठोस  तंत्र का निर्माण करना चाहिए | तभी, इस देश में अमन चैन का वातावरण तैयार  हों सकता है |


--अनुराग पाण्डेय

Wednesday, June 9, 2010

अमेरिका से सामरिक दोस्ती की प्रासंगिकता

कम्युनिस्ट और मुसलमानों के साथ ही भारत के अनेक लोग अमेरिका से ठोस सम्बन्ध बनाने के विरुद्ध रहते हैं | इनका कहना है कि अमेरिका विश्वसनीय नहीं है | ये लोग 71 के युद्ध का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा रहता है | अन्य उदाहरण भी दिए जाते हैं| किन्तु,यह आधा सच है | असल, में स्वतंत्रता के बाद हमारे हुक्मरानों ने कुछ ऐसे अतार्किक निर्णय लिए,जो अमेरिका सहित देश के विपक्ष और मीडिया को भी असहज करने वाले थे | चाहे चीन को मान्यता देने का प्रश्न  हों या फिर तिब्बत को उपहार स्वरूप चीन को प्रदान करने की बात हों |ये दोनों बातें अमेरिका को असहज करने वाले थे | इसी क्रम में 1956 में हंगरी के स्वतन्त्र चुनाव के मामले में, भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया जा सकता है | जब पंडित नेहरु की विदेश नीति की आलोचना जितनी अमेरिका ने  नहीं की, उतनी भारतीय जनता ने की थी | संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हंगरी में स्वतन्त्र चुनाव के प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करना किसी के भी समझ से परे था | ऐसे में अमेरिका पर अनर्गल आरोप लगाना, सही प्रतीत नहीं होता | किसी से ठोस  रिश्ते बनाना हमेशा द्विपक्षीय संबंधो पर आधारित होता है | आज देश पर कई तरह के खतरे हैं | पड़ोस में अशांति फ़ैलाने वाले देश हैं |जिनका मिशन भारत को नष्ट-भ्रष्ट करना है | ऐसे में, किसी शक्तिशाली देश से अत्यधिक मधुर सम्बन्ध बनाना समय की मांग है |इस मामले अमेरिका से बेहतर और कोई देश नहीं है | वह लोकतंत्र का हिमायती है | वो हमारे धार्मिक मूल्यों को अत्यधिक महत्त्व देता है |आज अमेरिका आर्थिक संकट में है | ऐसे में हम उसकी सहायता कर के अपने संबंधों को एक नया आयाम दे सकते हैं |
--अनुराग पाण्डेय

Wednesday, February 24, 2010

सारा कश्मीर हमारा है

 हमने समझा दोस्त उन्हें,वे दुश्मन हमें समझते हैं ,
नहीं फ़िक्र है उन्हें अमन की,बारम्बार उलझते हैं |
जब-जब हमने हाँथ मिलाया,उनसे सरल दोस्त बनकर,
तब-तब उनने घात किया है,सदा पीठ पीछे हमपर |
नहीं याद है उन्हें इखत्तर,का वह अमर युद्ध-सन्देश |
 जो टकराएगा हमसे,हों जायेगा वह खंडित देश |
क्षमा किया था हमने रण में,धूल चटाने के ही बाद |
यही सोचकर कि अब उन्हें,आएगी बुद्धि,न हों बर्बाद |
पर उनकी तो बुद्धि भ्रष्ट है,चढ़ आये फिर सीमा पर |
फिर ललकार हैं हमको,विगत पराजय विस्मृत कर |
विश्व-शांति अब रहे सुरक्षित,यही सोचकर हम सबने |
संयम से संघर्ष किया है,बलि दी हैं कितनी जानें |
न लो परीक्षा अब वर्ना,इच्छा सुन लो यह जन-जन की|
मिट जाएगी वो झूठी रेखा,वर्षों पूर्व विभाजन की |
सौ करोड़ कंठों का अब यह,एक अनूठा नारा है |
कारगिल से गिलगित तक,सारा कश्मीर हमारा है |
                                                                          साभार,
                                                                          स्वप्न और यथार्थ से
                                                                          रचनाकार-श्री अरविंदपाण्डेय                    

Sunday, February 7, 2010

''आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री''

अंततः ,भारत सरकार ने पकिस्तान के समक्ष वार्ता की पेशकश कर ही दी | अब यह अमेरिकी दबाव का नतीजा है या फिर, प्रधानमंत्री  की घुटना -टेक नीति का परिणाम है | इस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है | किन्तु,यह आतंकवाद और पाकिस्तान के समक्ष भारत का सीधा आत्मसमर्पण है | पिछले लोकसभा चुनाव में आडवाणी ने यह मुद्दा जोर शोर से उठाया था कि मनमोहन सिंह जी एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं | पर देश की जनता ने इस पर भरोसा न करते हुए, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपनी आस्था प्रकट कर दी थी | अब जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है | विश्व- बिरादरी में मनमोहन सिंह ने भारत की प्रतिष्ठा को एक गंभीर क्षति पहुंचाई है | पाकिस्तान ने तो उपहास उड़ाने वाले अंदाज में ये कहा कि यह बैश्विक दबाव का नतीजा है  कि भारत ने खुद वार्ता की पेशकश की है | यह कार्य ऐसे समय में किया गया, जब कि पाक. बार -बार यह कह रहा है कि हम मुंबई जैसे एक और हमले न होने की गारंटी नहीं दे सकते हैं वहीँ वह यह, भी कह रहा है कि आतंकवादियों को हम कश्मीर मामले में सहयोग देते रहेंगे | साथ ही कश्मीर पर बातचीत करने की बात भी करता है | अब देशवासी यह देखना चाहेंगे कि मनमोहन आडवाणी के कमजोर प्रधानमंत्री हैं या उनमे कुछ माद्दा भी है | होना तो यह चाहिए कि पाकिस्तान की  इच्छा के अनुरूप ही प्रधानमंत्री जी को सीधे कश्मीर मुद्दे पर ही बात करनी चाहिए | यह बातचीत संसद के उस प्रस्ताव के आलोक में करना चाहिए | जिसे 1994 में, संसद ने सर्वसम्मति से पारित करते हुए, यह कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और भारत किसी कीमत पर इसको वापस लेगा | यदि,मनमोहन ऐसा करते हैं, तब तो देशवासी, आडवाणी के आरोपों को झूठा मानेंगे | अगर ऐसा नहीं होता है, तब तो आडवाणी जी की बातों को ही देशवासी सत्य मानेंगे| अब,प्रधानमंत्री जी के सामने अग्नि-परीक्षा की स्थिति है | देश की इच्छा है कि वो बेदाग निकलें | अंत, में दिनकर की ये पंक्तियाँ उन्हें स्मरण रखनी चहिये कि -'' सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है, बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'

Tuesday, January 26, 2010

प्रजातंत्र को प्रजातंत्र ही रहने दो

                                        '' जनतंत्र, - गणतंत्र , प्रजातंत्र , 
                                           कुछ भी बोलो,आज सब बेमानी है |
                                           बीते हुए दिनों की,भूली हुई, दुखद कहानी  है |
                                           मै सह रहा था और कह रहा था ,
                                           प्रजातंत्र के नाम को,यूँ न बदनाम करो ,
                                           इसकी इज्जत को मत नीलाम करो |
                                           अपराधी, चोर, उचक्कों को मत संसद,पहुँचाओ ,
                                           प्रजातंत्र को प्रजातंत्र ही रहने दो ,
                                           इसे गुंडा-तंत्र न बना डालो | ''\

Saturday, January 23, 2010

आई.पी.एल. मालिकों का सही फैसला


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आज  ''सारिम अन्ना'' का लेख ' खेल भावना के खिलाफ', पढने को मिला | इस लेख में जो भी विचार व्यक्त किये हैं, मै समझता हूँ कि यह एक पक्षीय विचार है | जैसा कि सभी जानते है कि पाक सरकार की नीति में यह बात शामिल रहती है कि भारत और उसके नागरिकों को आतंकवाद की सहायता से निरंतर परेशान किये रहना है | पाक सरकार द्वारा पोषित पल्लवित और संरक्षित आतंकियों की एक टीम, अवैध रूप से देश की सीमाओं को पार कर के यहाँ आती  हैं तथा बम और गोलियां बरसा कर, निरीह और मासूम देशवासियों के साथ खून की होलियाँ  खेलती हैं | हमारे सम्मानित धर्मस्थलों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर धमाके कर के उन्हें ध्वस्त करती  हैं | ऐसे में उनकी दूसरी टीम  के साथ हम क्रिकेट खेल कर आपसी सौहार्द को कैसे कायम कर पाएंगे ? पाकिस्तान की इस दोहरी नीति को देशवासी अब सहन नहीं करेंगे |  यह आरोप कि इस फैसले में भारत के विदेश मंत्रालय की भूमिका है,बिलकुल वाहियात बात है | फिर , यदि इस आरोप को सही भी मान लिया जाय, तब तो विदेश मंत्रालय साधुवाद की पात्र है | ऐसे फैसलों के साथ सभी देशवासी  सरकार के साथ हैं | पाक को अब यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि इस तरह की कुटिल नीतियों का भारत जबरदस्त प्रतिकार करेगा | वैसे भी आये दिन हम क्रिकेट मैचों के दौरान देखते हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेटर भारतीय क्रिकेटरों के साथ नफ़रत की भावना के साथ पेश आते हैं | फिर, हमें आई.पी.एल. ;२' को भी याद रखना होगा | जिसमे खुद पाक सरकार ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों को आई.पी.एल. में खेलने से मना कर दिया था | हम शांति के उपासक जरूर हैं | पर अब यह एक तरफ़ा नहीं होगा | हमारा एक सिद्धांत यह भी है कि ''शठे शाठ्यम समाचरेत'' | अंत में भारत सरकार को भी यह याद रखना चाहिए कि '' क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दन्तहीन, विषहीन, विनीत सरल हो'' |--अनुराग पाण्डेय

भारत पर संभावित आतंकी हमला

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भारत सरकार ने 26 /11  जैसे एक और हमले की चेतावनी  जारी की है | पाकिस्तान से जिस तरह की प्रतिक्रिया की  उम्मीद थी, बिलकुल वही सामने आई | पाक के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने कहा कि उनकी सरकार 26 /11 जैसा  एक और हमला भारत में न होने की गारंटी नहीं ले सकता | प्रथम दृष्टया यह बात उचित ही जान पड़ती है | क्योंकि पाक खुद आतंकवाद से पीड़ित है | किन्तु, गहराई से विचार करने पर मालूम पड़ता है कि भारत व पाकिस्तान में आतंकी हमलों के लिए अलग -अलग कारण जिम्मेदार हैं भारत पर होने वाले हमले तो पाक सरकार और आतंकी संगठनो की सुनियोजित साजिश है | जिसका मिशन भारत को नष्ट कर देना  है| पर पाक में होने वाले आतंकी हमले तो उनका आपसी अंतरद्वंद मात्र है |जिसकी वजह, विश्व शक्तियों के दबाव में आ कर पाकिस्तान द्वारा अपने पोषित आतंकियों पर मजबूरी में किये जा रहे जा हमले हैं | वस्तुतः, पाक सरकार की आतंकियों के बिरुद्ध कार्यवाई महज दिखावा है | वो आतंकियों को जड़-मूल से समाप्त कर देने के उद्देश्य से उन पर हमले नहीं करता, बल्कि , अमेरिका से डालर और अत्याधुनिक शस्त्रास्तों को प्राप्त करने के लिए दुनिया की आखों में धूल झोंकता है | वैसे भी वहां की सरकार तो कठपुतली जैसी है | क्योंकि, पाक में सत्ता किसी एक जगह केन्द्रित न हो कर चार  'ए'  में विकेन्द्रित  है | ये चार हैं - आतंकवादी, आर्मी, आई.एस.आई . और अमेरिका | अतः भारत को पाक सरकार या अमेरिका  से किसी भी तरह के सहयोग की अपेक्षा न रखते हुए स्वयं को महाशक्तिशाली बनाने की दिशा में तेजी से कार्य करना होगा | किसी अन्य पर आश्रित रहने वाला देश अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर सकता | हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाक से भी ज्यादा बड़ा खतरा भारत के लिए 'चीन' है | जो चारों ओर से हमारी घेराबंदी कर रहा है | भारत के लिए निरंतर सतर्कता और शक्ति-अर्जन ही सुरक्षा एक मात्र विकल्प है | हमें शक्ति की उपासना करनी ही होगी | क्योंकि, इसी से हम विकास और सुरक्षा, दोनों की रक्षा का पाएंगे | रही बात आतंकी हमलों से स्थाई बचाव की, तो इसका एकमात्र उपाय इजराइली तर्ज पर, पाक में घुस कर आतंकी फैक्ट्रियों को जड़ से नष्ट करना ही एक मात्र उपाय है| हमें , हमले होने पर अमेरिका की ओर देखने की अपनी कायराना  प्रवृत्ति का परित्याग  करना होगा | यही , वो तरीका है जिससे हम स्वाभिमान पूर्वक इस विश्व बिरादरी में अपना स्थान बनाये  रख  सकते  हैं | समापन से पहले श्री दिनकर की निम्न पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं - ''
         
          ''सहनशीलता, क्षमा दया को, तभी पूजता जग है | बल का दर्प, चमकता उसके पीछे जब जगमग है |'' 

 --अनुराग पाण्डेय

Tuesday, January 12, 2010

भारत के पुनर्गठन का समय


                 आज स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है |जिसे हम भारत के लोग "राष्ट्रीय युवा दिवस" के रूप में जानते हैं | आज का दिन बड़ा ही गौरवशाली है, ऐसा इस लिए कि आज के ही दिन एक ऐसे योद्धा सन्यासी का इस धरती पर अवतरण हुआ, जिसने इस महान भारत भूमि के प्राचीन अध्यात्मिक तत्वों का अनुसंधान कर के हमें यह बताया कि भारत का पुनरुत्थान  धर्म-शक्ति से ही संभव है, पश्चिम के अन्धानुकरण से नहीं | उन्होंने हमें यह भी बताया कि भारत को फिर से महाशक्तिशाली बनाने में सभी आयु-वर्गों के लोगो को सम्मिलित योगदान देना होगा, विशेषतः युवाओं को | तभी हम भारत माता को फिर से उस महिमामयी स्थान पर प्रतिस्थापित कर पाएंगे जहां वो अतीत में विराजमान थी |
स्वामी जी के इन्ही उदात्त विचारों व् संदेशों का चिंतन करते हुए हमने आज के परिदृश्य पर एक नज़र डाली | मैंने पाया कि आज महान भारत वर्ष संक्रमणकाल से गुज़र रहा है | और भारत ही क्यूँ, सारा विश्व ही |
भारत  में हम अपने राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दुर्व्यवस्था पाते हैं | उदाहरण के लिए शिक्षा को ही लिया जाये | यद्यपि हमें ज्ञान- विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रो में व्यावहारिक विषयों कि शिक्षा तो दी जाती है, किन्तु उन सबका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है | जबकि प्राचीन शिक्षा-प्रणाली में ऐसी बात नहीं थी | शिक्षा का प्रथम उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह भारत के भावी नागरिकों को राष्ट्र के सांस्कृतिक आदर्शों को हृदयंगम कराये, क्योंकि उसी से वे भारत के सच्चे नागरिक बन सकते हैं | इस परिप्रेक्ष्य में हमारी वर्त्तमान शिक्षा-प्रणाली एकदम असफल रही है | परिणामतः छात्र अपनी सांस्कृतिक जड़ो से, जिनके द्वारा राष्ट्र संगठित था, दूर होते जा रहे हैं | आर्थिक क्षेत्र में भी इसी प्रकार कि दुर्व्यवस्था विद्यमान है | ग़रीबी व भुखमरी दूर करने के हमारे लाख प्रयासों के बावजूद जन-साधारण कि दशा और दिशा बाद से बदतर होती जा रही है | यदा-कदा हमें ऐसे कथन सुनने को मिलते रहते हैं कि "राष्ट्रीय आय में 2% की वृद्धि हुई, 4% की वृद्धि हुई |" हो सकता है कि यह सही हो, पर ग़रीबों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता क्योंकि वृद्धि का एक छोटा-सा अंश ही उन तक पहुँच पता है |
जब तक उनकी आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक अवस्थाओं में उन्नति नहीं होगी, देश के लिए कोई आशा नहीं है | इसे कारगर करने के लिए केवल सरकार का मुंह देखने से नहीं चलेगा, बल्कि,समाज के सभी लोगों को एकजुट इस कार्य को अपने हाथों में लेना होगा |धनिक वर्गों को उनकी दशा सुधारने के लिए सामने आना पड़ेगा और उनकी सहायता करनी होगी | इससे केवल जनता का और देश का ही भला नहीं होगा, बल्कि, अप्रत्यक्ष रूप से उनका स्वयं का भला भी होगा | धनिक वर्ग जन-साधारण की सहायता के लिए जितना शीघ्र आगे आयेंगे ,देश के लिए उतना ही अच्छा है |
प्राचीन युग में समाज की संरचना समाजवादी आधार पर हुई थी | सभी से यह आशा की जाती थी कि वह किसी न किसी प्रकार से समाज व राष्ट्र की सेवा करे | इसके साथ ही समाज ने लोगों को जीवन-आनंद लेने के लिए कुछ छूट भी दी थी,किन्तु; कुछ सीमाओं के साथ, जिससे राष्ट्र का जीवन असंतुलित न हो | पर आज तो हम राष्ट्रीय-जीवन में बिलकुल  विपरीत धारा पाते हैं | जिससे ऐसी गंभीर समस्याएं उठ खड़ीं हुई है ,जिनका समाधान हम नहीं कर प् रहे हैं | शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, उद्योग, श्रम, और ब्यवसाय के क्षेत्र का जो हाल है, उससे हम सभी भली-भांति परिचित हैं | ये सारे क्षेत्र भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता से विषाक्त हो गए हैं |जहाँ मौलिक अधिकारों की बात तो की जाती है, लेकिन देश के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध नहीं कराया जाता है | राजनीतिक क्षेत्र में तो स्थिति और भी बदतर है | जिसने समूचे राष्ट्रीय-जीवन को अस्त -व्यस्त कर दिया है | राष्ट्रीय दृष्टिकोण में मूलभूत परिवर्तन लाना ही इस महामारी का निदान है | सिर्फ संसद में क़ानून बना कर स्थिति में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता | बदलाव,  स्वामी जी के बताये  धर्म-मार्ग पर चल कर ही सम्भव है | धर्म से मेरा आशय, कतिपय आडम्बरपूर्ण आस्थाओं से नहीं है, अपितु, आध्यात्मिक तत्वों की प्रत्यक्ष अनुभूति से है | वर्तमान युग की दुर्दशा से रक्षा के लिए आध्यात्मिकता संपन्न एक नए विचार एवं सन्देश की आवश्यकता है | ऐसा सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि, सारे संसार के लिए | इसलिए, मित्रों मैं आपमें से प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि आप व्यक्तिगत रूप से इस पावन कार्य में सक्रिय रूचि लें और साथ ही लोगों की भी भागीदारी सुनिश्चित करें | आप सरकार से ज़्यादा आशा न रखें, क्योंकि वह अकेले विशेष कुछ नहीं कर पाती है | सरकार ने जिन बड़ी बड़ी योजनाओं को स्वीकृत किया है और कानूनों को पारित किया तथा वह भविष्य में  जो कुछ भी स्वीकृत और पारित करेगी, उनका क्रियान्वयन तब तक सम्भव नहीं हो सकता, जब तक हम उन्हें नहीं अपनाते हैं |
अतः सरकार की ओर अपलक निहारानें और उसे दोष देने में कोई अच्छाई नहीं है | क्योंकि वह भी आखिर इसी समाज का एक अंग है |आप स्वयं आगे बढिए और इस कार्य को अपनाइए, तब जो भी शासन सत्तारूढ़ होगा, वह अपने आप मार्ग पर आ जायेगा | अतएव, अब समय आ गया है,  जब हमें स्वामी जी का अनुसरण करना ही होगा |...

--अनुराग पाण्डेय 

Wednesday, December 30, 2009

देश की कुल जनसंख्या ११५ करोड़ है, इसमें से ७७ करोड़  भारतीय भयंकर रोगों की चपेट में हैं | ५ करोड़ भारतीय मधुमेह, ४.५० करोड़ लोग ह्रदय रोग, १२ करोड़ लोग नेत्र रोग, १.१७ करोड़ घुटने और १४ करोड़ लोग दमा,अस्थमा रोग से पीड़ित हैं| इस हिसाब से जितने चिकित्सक देश में होने चाहिए, उससे कई सौ  गुना  कम चिकित्सक वर्तमान में मौजूद हैं| ७७ करोड़ रोगियों के सापेक्ष  मात्र २५ लाख चिकित्सक ही देश में हैं| यदि, एक चिकित्सक दिनभर कार्य करके सौ मरीजों का उपचार करे तो २५ लाख चिकित्सक ढाई करोड़ रोगियों का ही उपचार कर सकते हैं | इस गंभीर समस्या का समाधान  योग और प्राणायाम से चिकित्सा का प्रचार- प्रसार करके किया जा सकता है |योग और प्राणायाम से लाइलाज बीमारियों  का भी उपचार किया जा सकता है | भारत में इतने अधिक रोगी हैं कि उनके अनुपात में चिकित्सकों का भारी अभाव है | योग व् प्राणायाम से सभी लोग स्वतः ही निरोगी हो सकते हैं |इसके लिए लोगों को योग व् प्राणायाम का प्रशिक्षण प्राप्त करना ही एक मात्र उपाय है | अत: सभी सज्जनों को इससे लाभ उठाना चाहिए | जो रोगी हैं, वो निरोग रहने के लिए एवं जो रोगी नहीं हैं, उन्हें सदा पूर्ण स्वस्थ  रहने के लिए योग,प्राणायाम का प्रशिक्षण प्राप्त करना ही चाहिए |यह समय कि मांग है |